Nov 5, 2018
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आइये जानें धनतेरस और उससे जुड़ी पौराणिक कथा………..

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धनतेरस, धनतेरस के दिन से ही भारत के सबसे महत्वपूर्ण उत्सव दीपावली का आरम्भ होता है। धनतेरस के दिन से पाँच दिनों का ये महाउत्सव प्रारम्भ होता है। धनतेरस के बाद नरक चौदस या छोटी दीपावली, मुख्य दीपावली, गोवर्द्धन पूजा और भाई दूज का उत्सव मनाया जाता है।

धनतेरस की पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीनकाल में जब एक बार यमराज के सामने जब एक प्राणी के प्राण हरण कर उसे उसके किये गये और उसे उसके कर्मो की सज़ा दी जा रही थी तो यमराज के मस्तिष्क में एक प्रश्न आया। उन्होंने अपने दूतों से पूछा कि क्या तुम लोगों को मनुष्य के प्राण हरते हुए उन पर दया नहीं आती है? यमराज के मुख से यह अचंभीत प्रश्न सुनकर यमदूत बाले- नहीं महाराज! हम दूतगण तो केवल आपकी आज्ञा का पालन करते हैं। हमें इन पर दया क्यों आयेगी।

यमराज को आभास हुआ कि ये अपने भाव प्रकट करने में संकोच कर रहें हैं। अतः सतावना देते हुए यमराज बोलते हैं संकोच मत करों जो भी भाव हृदय में हो बता दो। यदि कभी भी तुम लोगों के हृदय में ऐसा भाव आया हो तो डरो मत बता दो। तब यमदूतों ने घबराहट के साथ कहा- हाँ महाराज! एक बार एक घटना घटी थी जिसे देखकर हमारा हृदय भी कांप उठा था।

धनतेरस और उससे जुड़ी पौराणिक कथा

यमराज ने पूछा- वो ऐसी कौन सी घटना थी जो तुम लोगों हृदय कांप उठा? तब दूतों ने यमराज को बताया कि महाराज! एक बार एक हंस नाम था जो एक बार शिकार के लिए गया था। वह अपने साथियों के साथ जंगल में गया था। फिर एक जानवर का पीछा करते-करते अपने साथियों बिछड़ जाता है और तभी उसे आभास होता है कि वह जानवर का शिकार का करते-करते दूसरे राज्य की सीमा में आ गया है। जिस राज्य में वह अंजाने में दाखिल हुआ था वो राज्य हेमा नाम के राजा का है। जब यह खबर राजा हेमा के पास पहुँची तो उन्होंने राजा हंस का बहुत अच्छा स्वागत किया।

जिस दिन राजा हंस आये थे उसी दिन राजा हेमा की पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया था। पंडित और ज्योतिषों ने गणना करके बताया कि इस बालक की आयु अल्प है। यह बालक अपने विवाह के चौथे दिन मर जायेगा। यह सुनकर राजा हेमा ने आदेश दिया कि इस बालक को यमुना के पास एक गुफा में ब्रह्मचारी बना कर रखा जायेगा। राजा ने आदेश दिया की इस बालक के पूरे जीवन काल किसी भी स्त्री की इस बालक पर छाया भी नहीं पड़नी चाहिए।

परन्तु विधि का विधान कौन बदल सकता है। समय गुजरता गया। एक दिन राजा हंस की युवा बेटी यमुना तट पर निकल गयी और उन्होंने उस ब्रह्मचारी बालक से गंधर्व विवाह कर लिया। चौथा दिन आ गया और जैसा कि गणना की गयी थी चौथे दिन ब्रह्मचारी बालक जिसका नाम राजकुँवर था उसकी मृत्यु हो जाती है।

यमदूतों ने यमराज को बताया कि ऐसी सुंदर जोड़ी थी उनकी कि इससे पहले उन्होंने कभी ऐसी जोड़ी देखी भी नहीं थी। उनकी जोड़ी कामदेव और रति की जोड़ी से कम नहीं थी। यह वह समय था जब उस ब्रह्मचारी बालक के प्राण हरते समय हमारे चक्षु से भी अश्रु थम नहीं पा रहें थे।

इस कहानी को सुनकर यमराज का हृदय भी भावुक हो गया था। यमराज ने भावुक होकर कहा- हम इसमें क्या कर सकते है। ये तो विधि का विधान है, और हम सब अपने कर्त्तव्य में बंधे हुए हैं हम चाह कर इस बारे में कुछ नहीं कर सकते हैं।

तभी एक दूत यमराज से प्रश्न करता है कि महाराज! क्या अकाल मृत्यु से बचने के लिए कोई उपाय नहीं है? यमराज इस प्रश्न का जवाब देते हुए घोषणा करते हुए कहते हैं कि अब से इस दिन धनतेरस के नाम से जाना जायेगा और इस दिन विधिपूर्वक पूजन करने और दीपदान करने से अकाल मृत्यु वाले मनुष्यों को इससे छुटकारा मिलेगा।

इस घटना के बाद इस दिन धन्वंतरि पूजन सहित दीपदान की प्रथा का प्रचलन शुरू हुआ और इसे धनतेरस के नाम से जाना जाने लगा।

 

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