Nov 1, 2018
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पशु-पक्षियों, मछलियों की भारी आबादी में हुई कमी, संकट की सम्भावना बढ़ती जा रही है

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जैसे-जैसे हमारा देश उन्नति करता जा रहा है वैसे-वैसे हमारे देश के जानवरों के लिए खतरा भी बनता जा रहा है। कई जानवर विलुप्त हो गये हैं तो कुछ विलुप्त होते जा रहे हैं। अगर ऐसा रहा तो वह दिन दूर नहीं जब सभी जानवर इस पृथ्वी से गायब हो जाएंगे। मानव सभ्यता पशु-पक्षियों तथा बाकी जानवरों के लिए एक खतरा सा बनता जा रहा है।

नगरीकरण के कारण जंगल के सभी पेड़-पौधों को काटा जा रहा है जिससे वहां पर स्थित सभी जानवर अपने आप को सुरक्षित न पाकर धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं। वर्ल्ड वाइल्ड फंड (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) की लिविंग प्लानेट रिपोर्ट ऑफ द ग्लोबल फंड फॉर नेचर नामक रिपोर्ट के मुताबिक 1970 से 2014 के बीच कशेरुकी प्राणियों की 60 फीसद आबादी खत्म हो चुकी है। 2010 तक ये आबादी 48 फीसद बाकी थी।

2010 तक कशेरुकी प्राणियों की आबादी 48 फीसद थी जो 2014 में घटकर 40 फीसद रह गई है। सबसे अधिक खतरा ताजे पानी में रहने वाले जीवों के लिए बढ़ रहा है। नदियों और झीलों के प्रदूषण की वजह से 83 फीसद जलीय जीव आबादी खत्म हो चुकी है।

वैश्विक स्तर पर प्रकृति सालाना तकरीबन ताजा हवा, स्वच्छ पानी, खाद्य सामग्री और ऊर्जा के रूप में 125 लाख करोड़ डॉलर की सेवाएं प्रदान करती है। लेकिन पिछले 50 सालों में प्राकृतिक संसाधनों की खपत तकरीबन 190 फीसद तक बढ़ी है और इंसानों द्वारा बढ़ता दळ्रुपयोग खतरा बन रहा है।

पिछले 50 सालों में 20 फीसद अमेजन के जंगल और 30 से 50 फीसद मैंग्रोव (कच्छ वनस्पति) नष्ट हो चुकी हैं। वहीं 30 सालों में 50 फीसद उथले पानी में समुद्री शैवाल खत्म हुए हैं।

मानव सभ्यता की शुरुआत से अभी तक 83 फीसद स्तनधारी जीव और 50 फीसद पेड़-पौधे खत्म हो चुके हैं। पृथ्वी को दोबारा पहले जैसा बनाने में 50 से 70 लाख साल लगेंगे।

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